21 Sant Kabir Das Ke Dohe संत कबीर दास बढ़िया दोहे हिंदी में पढ़िए

Sant Kabir Das ने अपने दोहो के माध्यम से ऐसी बात कही है। अगर लोग इन बातो में से एक पर भी अमन करे तो उसके जीवन में कोई समस्या भी समस्या नहीं आयेगी क्योंकि kabir ke dohe अपने आप में एक ऐसी अनुभूति दिलाती है जिन्हे पढ़कर लोंगो को जीवन में कुछ हासिल करने की प्रेरणा मिलती है। किसी भी काम को करने के साथ उसने सफल होने के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा योगदान रहता है।

kabir ke dohe

Kabir das dwara likhe gaye best dohe hindi arth sahit

  • जाती न पूंछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान |
  • मोल करो तलवार का, पड़े रहन दो म्यान ||

अर्थ :- किसी सज्जन पुरुष जिसके पास ज्ञान है उसकी जाती न पूछकर उससे ज्ञान अर्जित करना चाहिए क्योंकि जाती एक तलवार की म्यान की तरह है जो सिर्फ तलवार रखने के काम में आती है।

  • अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप |
  • अति की न बरसना अति, की भली न धूप ||

अर्थ :-जिस तरह अधिक या कम वर्षा होने हानि होती है ठीक उसी तरह जरूरत से ज्यादा बोलने और समय पर कम बोलने से भी हानि होती है।

  • माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर |
  • आशा तृष्णा ना करो, कह गए दास कबीर ||

अर्थ :- मन हमेशा माया की ओर आकर्षित होता है और जब तक हम अपने मन को बस में नहीं कर लेते मन माया की ओर जायेगा लेकिन माया से मन को कभी भी शांति नहीं मिलती इसीलिए माया के पीछे नहीं भागना चाहिए।

  • दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार |
  • तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ||

अर्थ :-मनुष्य जन्म लम्बे समय के बाद मिलता है इसे हमे नष्ट न करते हुए अच्छे कर्मो में लगाना चाहिए क्योंकि किस तरह पेड़ से झड़े हुए पत्ते फिर से नहीं लग सकते ठीक उसी प्रकार यह जीवन फिर से नहीं मिलता।

  • माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर |
  • कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर ||

अर्थ :- कबीर दास  जी कहते है की मनुष्य तेरा जीवन सिर्फ सुख सुविधाओं को जुटाने में बीत है रहा है जिसका कोई मोल नहीं तू एक बार अपने मन की माला जो चाहता है इसका जाप कर तुझे तेरा जीवन धन्य हो जायेगा।

  • बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानी |
  • हिये तराजू तौली के, तब मुख बाहर आनि ||

अर्थ :- वाणी एक अनमोल रत्न है इसके द्वारा दुनिया की कोई चीज पा भी सकते है और खो भी सकते है इसीलिए इसे अपने मन के तराजू में तौलकर ही मुँह बाहर निकलना चाहिए।

  • मक्खी गुड़ में गड़ी रहे, पंख रहे लपटाये |
  •  हाथ मले और सर ढूंढे, लालच बुरी बलाय ||

अर्थ :- जिस तरह मक्खी को गुड़ को देख यह लालच आता है। की मैं उस गुड़ को जाकर खाऊ मगर वह जैसे ही उस गुड़ पर बैठती है और उसी में चिपक जाती है ठीक उसी तरह मनुष्य को किसी भी चीज का लालच नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका परिणाम हमेशा बुरा होता है।

  • जिन खोजा तीन पाइया , गहरे पानी पैठ |
  •  मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ||

अर्थ :- कबीर दस जी कहते है की जो व्यक्ति जितनी मेहनत करता है उसे उतना ही फल मिलता है जैसे कोई गोताखोर नदी के गहरे पानी में जाकर मोती ढूंढ लेता है और किनारे पर बैठा आदमी सिर्फ उसकी अभिलाषा रखता है और उसे पाने के बारे में सोचता ही रह जाता है।

  • साईं इतना दीजिये, आँगन कुटी छवाय |
  • मैं भी भूखा न रहुँ, साधु ना भूखा जाय ||

अर्थ :- कबीर दास  जी कहते है की हे प्रभु ! मुझ पर इतनी कृपा रखना की मैं कभी भी भूखा न रहुँ और अगर कोई साधु मेरे घर पर आये तो मैं उसे भी खाली हाथ न लौटाऊ।

In kabir ke dohe dwara hum jeevan me inspiration le sakte hai

  • कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय |
  • दुरमति दूर बहवासी, देशी सुमति बताय ||

अर्थ :- सकारात्मक एक ऐसी ऊर्जा है जिससे कुछ भी हासिल किया जा सकता है इसीलिए हमेश ऐसे लोगो की संगत करनी चाहिए जो हमेशा सकारात्मक सोचे जिससे तुम्हारी सोच भी सकारात्मक हो जाये।

  • माटी कहे कुम्हार से, तू का रौंदे मोये |
  • एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदूंगी तोय ||

अर्थ :- कबीर दास ने इस दोहे में समझाया है की यह जीवन एक माटी रूपी घड़े के समान है जिसे कुम्हार अपने पैरो से रौंदकर बहुत खुश होता है पर वह यह भूल जाता है की यह शरीर  भी माटी का है और इसे भी एक दिन माटी में ही मिल जाना है।

  • पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय |
  • ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||

अर्थ :- जिसके पास जिसके पास सिर्फ शब्दों का ज्ञान है जो उस ज्ञान का अर्थ नहीं समझता है वह ज्ञान उस के किसी काम का नहीं है पर जिस ढाई अक्षर रूपी ज्ञान को समझ लिया वो सच्चा ज्ञानी और विद्वान कहलाता है।

  • दुःख में सुमरिन सब करे, सुख करे न कोय |
  • जो सुख में सुमरिन करे, दुःख काहे को होय ||

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है की जब हमारे ऊपर दुःख आता है तो हम उसी समय भगवान को याद  करते है सुख के समय कोई याद नहीं करता यदि भगवान को सुख के समय याद किया जाय तो हमे कभी किसी बात का दुःख ही न हो।

  • चाह मिटी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह |
  • जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहंशाह ||

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है कि – इंसान जितनी मेहनत करता है उसे उतना ही फल मिलता है जैसे गोताखोर गहरे  पानी में जाता है तो वहा से कुछ लेकर ही आता है जो किनारे पर बैठा पर बैठा रहता है, उसे कुछ नहीं मिलता।

  • तिनका कबहुं उडी आखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय |
  • कबहू उडी पड़े ,  पीर घनेरी होय ||

अर्थ :- अगर इंसान के पैर के नीचे कभी तिनका भी आ जाय, तो उसे उसकी भी बुराई नहीं करनी चाहिए क्योंकि यदि वही तिनका आँख में आ जाए तो बहुत ही पीड़ा होती है

  • धीरे धीरे सौ घड़ा , धीरे सब कुछ होय |
  •   माली सींचे सौ घड़ा, आए फल होय ||

अर्थ :- हमेशा धैर्य से काम लेना चाहिए यदि माली एक दिन में ही सौ घड़ो से पेड़ों को सींचेगा तब भी उस पेड़ में फल उस का समय आपने पर ही लगेंगे

  • रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय |
  •  हीरा जन्म अमोल सा , कोड़ी बदले जाय ||

अर्थ :- अपनी जीवन की राते तुमने सोने में गुजार दी और दिन खाने में यह जीवन हीरे के समान अनमोल है पर इसे तुम एक कौड़ी के समान व्यर्थ किये जा रहे हो।

  • बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |
  •  पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ||

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है की कोई  व्यक्ति अगर खजूर के पेड़ के समान बड़ा है तो उसका कोई लाभ नहीं क्योकि न तो खजूर किसी को छाया दे सकता है और न फल।

  • आछे/पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत |
  • अब पछताय होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत ||

अर्थ :- जिस तरह किसान के खेत की रखवाली समय पर नहीं करता और उसके खेद की फसल चिड़िया चुग लेती है ठीक उसी तरह धीरे-धीरे समय अपनी गति से बीतता चला गया, और जब तुम्हारे पास समय था तब तो तुमने प्रभु को याद ही नहीं किया तो अब पछताने से क्या फायदा।

  • मांगन मरण समान है , मति मांगो कोई भीख |
  •  मांगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख ||

अर्थ :- कबीर दास जी  कहते है कि मांगना मरने के समान है क्योंकि हम मांगते तो एक बार है पर उसका कर्ज जीवन भर रहता है इसीलिए कभी किसी से कुछ नहीं मांगना चाहिए।

  • बुरा जो देखन मैं चला , बुरा न मिलिया कोय |
  • जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ||

अर्थ :- जब मैं इस दुनिया में जो भगवान ने बनाई है बुराई को खोजने के लिए चला तो मुझे कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं मिला, पर जब मैंने अपने अंदर झाँका तो, पता चला की मुझसे बुरा कोई नहीं है।

Kabir ke dohe हिंदी अर्थ सहित आपको जरूर पसंद आये होंगे आपको जरूर पसंद आये होंगे लोगो को भी इन कबीर दोहे के बारे में पता चल सके इसलिए इन्हे फेसबुक व्हाट्सप्प आदि पर जरूर शेयर करें।

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